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हिन्दी के महावीर युग प्रणेता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
09-May-2018    |    Views : 000127

हिन्दी के महावीर युग प्रणेता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

विशेष

LUCKNOW.  हिन्दी साहित्य के गौरवशाली नक्षत्र महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपने अनूठे लेखन शिल्प के कारण हिन्दी का प्रथम लोकमान्य आचार्य माना जाता है। इनका जन्म ग्राम दौलतपुर (रायबरेली, उ.प्र.) में नौ मई, 1864 को पंडित रामसहाय दुबे के घर में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई, जबकि बाद में वे रायबरेली, रंजीतपुरवा (उन्नाव) और फतेहपुर में भी पढ़े।

शिक्षा प्राप्ति के समय ही इनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचय सबको होने लगा था। इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। शिक्षा प्राप्ति के बाद इन्होंने कुछ समय अजमेर, मुम्बई और झाँसी में रेल विभाग में तार बाबू के नाते काम किया। 

इस राजकीय सेवा में रहते हुए उन्होंने मराठी, गुजराती, बंगला और अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाया। झाँसी में किन्हीं नीतिगत विरोध के कारण इन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद इंडियन प्रेस, प्रयाग के स्वामी बाबू चिन्तामणि घोष के प्रस्ताव पर इन्होंने ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादन का दायित्व सँभाला। थोड़े ही समय में सरस्वती पत्रिका लोकप्रियता के उत्कर्ष पर पहुँच गयी। इसका अधिकांश श्रेय आचार्य महावीर प्रसाद जी को ही जाता है। आचार्य जी ने 1903 से 1920 तक इस पत्रिका का सम्पादन किया। 

हिन्दी भाषा के लेखन में उन दिनों उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों की घुसपैठ होने लगी थी। आचार्य जी इससे बहुत व्यथित थे। उन्होंने सरस्वती के माध्यम से हिन्दी के शुद्धिकरण का अभियान चलाया। इससे हिन्दी के सर्वमान्य मानक निश्चित हुए और हिन्दी में गद्य और पद्य का विपुल भंडार निर्माण हुआ। इसी से वह काल हिन्दी भाषा का ‘द्विवेदी युग’ कहा जाता है।

सरस्वती के माध्यम से आचार्य जी ने हिन्दी की हर विधा में रचनाकारों की नयी पीढ़ी भी तैयार की। इनमें मैथिलीशरण गुप्त, वृन्दावन लाल वर्मा, रामचरित उपाध्याय, गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’ लोचन प्रसाद पाण्डेय, नाथूराम शंकर शर्मा, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’, हरिभाऊ उपाध्याय, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, देवीदत्त शुक्ल आदि प्रमुख हैं। 

उन्होंने स्वयं भी अनेक कालजयी पुस्तकें लिखीं। इनमें हिन्दी भाषा का व्याकरण, भाषा की अनस्थिरता, सम्पत्ति शास्त्र, अयोध्या विलाप आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त उनकी फुटकर रचनाओं की संख्या तो अगणित है। आचार्य जी ने यद्यपि साहित्य रचना तो अधिकांश हिन्दी में ही की; पर उन्हें जिन अन्य भाषाओं की जानकारी थी, उसके श्रेष्ठ साहित्य को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाया। 

आचार्य जी को अपने गाँव से बहुत प्रेम था। साहित्य के शिखर पर पहुँचकर भी उन्होंने किसी बड़े शहर या राजधानी की बजाय अपने गाँव में ही रहना पसन्द किया। वे यहाँ भी इतने लोकप्रिय हो गये कि लोगों ने उन्हें दौलतपुर पंचायत का सरपंच बना दिया। जब लोग उनके इस निर्णय पर आश्चर्य करते, तो वे कहते थे कि भारत माता ग्रामवासिनी है। यहाँ मैं अपनी जन्मभूमि का कर्ज चुकाने आया हूँ। उन्हें लेखन और गाँव की समस्याओं को सुलझाने में समान आनन्द आता था।

खड़ी बोली को हिन्दी की सर्वमान्य भाषा के रूप में स्थापित और प्रचारित-प्रसारित कराने वाले युग निर्माता आचार्य जी 21 दिसम्बर, 1938 को रायबरेली में चिरनिद्रा में सो गये। उनके लिए किसी ने ठीक कहा है कि वे सचमुच हिन्दी के ‘महावीर’ ही थे।

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