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श्रेष्ठ नाटककार में शुमार उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’
14-Dec-2018    |    Views : 000143

श्रेष्ठ नाटककार में शुमार उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’


Lucknow. उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ का जन्म 14 दिसम्बर, 1910 को जालन्धर(पंजाब) में हुआ था। मुस्लिम प्रभाव के कारण पंजाब में व्यापारिक हिसाब और शिक्षा का माध्यम उर्दू ही थी। उर्दू को साहित्य सृजन के लिए श्रेष्ठ और सम्पन्न भाषा माना जाता था। बोलचाल में भी पर्याप्त उर्दू फारसी शब्दों का प्रयोग लोग करते थे। ऐसे में अश्क जी की प्रारम्भिक शिक्षा साईंदास संस्कृत विद्यालय में हुई। इससे उनके और उनके परिवार के रुझान का पता लगता है।

इसके बाद अश्क जी ने जालन्धर के डी.ए.वी. कॉलिज से बी.ए और फिर कानून की डिग्री प्राप्त की। 1931 में शिक्षा पूर्ण कर उन्होंने आजीविका के लिए अध्यापन कार्य को अपनाया। उनके मन में बचपन से ही साहित्य के प्रति प्रेम था। अभी तक तो यह केवल अच्छे गद्य और पद्य साहित्य के पढ़ने तक सीमित था; पर 1933 में वे स्वयं इसमें सक्रिय रूप से जुड़ गये। उर्दू माहौल के कारण उन्होंने अपना प्रारम्भिक लेखन उर्दू में ही किया।

पर उर्दू की व्यापकता पूरे भारत में नहीं थी। अतः उन्होंने हिन्दी भाषा को अपने सृजन का आधार बनाया। 1944 में वे ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े और हिन्दी सलाहकार के रूप में उनकी नियुक्ति दिल्ली में हो गयी। राजधानी दिल्ली पहुँच कर उनके सम्पर्क का क्षेत्र स्वाभाविक रूप से बढ़ गया। अब उनके साहित्य निर्माण की गति भी दुगनी हो गयी।

उन दिनों देश में मूक फिल्मों के बाद बोलती फिल्में बनने लगी थीं। धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्मों के साथ भावनात्मक कहानियों पर भी फिल्में बन रही थीं। अतः हिन्दी और उर्दू में लिखने वाले उत्तर भारत के अनेक साहित्यकार मुम्बई जाने लगे। वहाँ पैसा और प्रसिद्धि दोनों ही भरपूर मिलती थी।

‘अश्क’ जी पर उनके मित्रों ने इसके लिए दबाव डाला, तो उन्होंने भी एक दिन मुम्बई की राह पकड़ ली। 1945 से उन्होंने फिल्मों में पटकथा लिखना प्रारम्भ किया; पर उनका मन मायानगरी मुम्बई के बनावटीपन में अधिक समय तक नहीं लग सका। अतः फिल्मी दुनिया छोड़कर उन्होंने फिर से कहानी, कविता, नाटक और उपन्यास लिखने प्रारम्भ किये।

धीरे-धीरे इस क्षेत्र में उनकी पहचान बनने लगी। यों तो साहित्य की प्रायः हर विधा में उन्हें सफलता मिली; पर उनके नाटकों को लोगों ने अधिक पसन्द किया। उन्होंने लगभग 50 एकांकी लिखे, जिन्हें लोग आज भी बड़े चाव से देखते हैं। देवताओं की छाया में, पर्दा गिराओ, चरवाहे, अन्धी गली, साहब को जुकाम है.. आदि उनके एकांकी संग्रह हैं।

छठा बेटा, अंजो दीदी और कैद उनके सर्वश्रेष्ठ एकांकी हैं। उनके नाटकों की विशेषता यह थी कि वे पात्रों से छोटे और जन सामान्य की भाषा में संवाद बुलवाते थे। इससे वे श्रोताओं के मन में शीघ्रता से उतर जाते थे। उनके उपन्यासों में गिरती दीवारें, गर्म राख, शहर में घूमता आइना, एक नन्हीं कन्दील आदि उल्लेखनीय हैं। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी ‘डाची’ मानी जाती है।

अश्क जी को प्रेमचन्द की परम्परा का उपन्यासकार माना जाता है। उनके साहित्य में आदर्श और यथार्थ दोनों के उचित समन्वय के दर्शन होते हैं। वे अपने उपन्यासों में मध्यमवर्गीय परिवारों के जीवन का सजीव चित्रण करते थे, जिससे पाठक को यह अपने जीवन की ही कथा लगती थी।

उन्होंने आलोचना, संस्मरण, निबन्ध, समीक्षा, अनुवाद आदि विधाओं में भी काम किया। 1963 में ललित कला अकादमी ने इन्हें श्रेष्ठ नाटककार का सम्मान दिया। 19 जनवरी, 1996 को ‘अश्क’ जी का देहांत हुआ।

 

 

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