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सत्य की खोज ने मूलशंकर को बनाया दयानंद सरस्वती
12-Feb-2019    |    Views : 00045

LUCKNOW. दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फ़रवरी टंकारा में सन् 1824 में मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था। उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था।

सत्य की खोज ने मूलशंकर को बनाया दयानंद सरस्वती

LUCKNOW. दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फ़रवरी टंकारा में सन् 1824 में मोरबी (मुम्बई की मोरवी रियासत) के पास काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट), गुजरात में हुआ था। उनके पिता का नाम करशनजी लालजी तिवारी और माँ का नाम यशोदाबाई था। उनके पिता एक कर-कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण परिवार के एक अमीर, समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। आगे चलकर एक पण्डित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए।

उनके जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर के बारे में गंभीर प्रश्न पूछने के लिए विवश कर दिया। एक बार शिवरात्रि की घटना है। तब वे बालक ही थे। शिवरात्रि के उस दिन उनका पूरा परिवार रात्रि जागरण के लिए एक मन्दिर में ही रुका हुआ था। सारे परिवार के सो जाने के पश्चात् भी वे जागते रहे कि भगवान शिव आयेंगे और प्रसाद ग्रहण करेंगे। उन्होंने देखा कि शिवजी के लिए रखे भोग को चूहे खा रहे हैं। यह देख कर वे बहुत आश्चर्यचकित हुए और सोचने लगे कि जो ईश्वर स्वयं को चढ़ाये गये प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वह मानवता की रक्षा क्या करेगा? इस बात पर उन्होंने अपने पिता से बहस की और तर्क दिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की उपासना नहीं करनी चाहिए।

अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और ऐसे प्रश्न करने लगे जिससे उनके माता पिता चिन्तित रहने लगे। तब उनके माता-पिता ने उनका विवाह किशोरावस्था के प्रारम्भ में ही करने का निर्णय किया (19वीं सदी के आर्यावर्त (भारत) में यह आम प्रथा थी)। लेकिन बालक मूलशंकर ने निश्चय किया कि विवाह उनके लिए नहीं बना है और वे 1846 में सत्य की खोज में निकल पड़े।

फाल्गुन कृष्ण संवत् 1895 में शिवरात्रि के दिन उनके जीवन में नया मोड़ आया। उन्हें नया बोध हुआ। वे घर से निकल पड़े और यात्रा करते हुए वह गुरु विरजानन्द के पास पहुंचे। गुरुवर ने उन्हें पाणिनी व्याकरण, पातंजल-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा- विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि ईश्वर उनके पुरुषार्थ को सफल करे। उन्होंने अंतिम शिक्षा दी -मनुष्यकृत ग्रंथों में ईश्वर और ऋषियों की निंदा है, ऋषिकृत ग्रंथों में नहीं। वेद प्रमाण हैं। इस कसौटी को हाथ से न छोड़ना।

महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर 'पाखण्ड खण्डिनी पताका' फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। यहीं से उन्होंने पूरे वस्त्र पहनना तथा हिन्दी में बोलना व लिखना प्रारंभ किया। यहीं उन्होंने तत्कालीन वाइसराय को कहा था, मैं चाहता हूं विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है। परंतु भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक-पृथक शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का व्यवहार पूरा उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है।

महर्षि दयानन्द ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा संवत् 1932(सन् 1875) को गिरगांव मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के नियम और सिद्धांत प्राणिमात्र के कल्याण के लिए है। संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है - इस सत्य का प्रचार करने के लिए स्वामी जी ने सारे देश का दौरा करना प्रारंभ किया और जहां-जहां वे गये प्राचीन परंपरा के पंडित और विद्वान उनसे हार मानते गये। संस्कृत भाषा का उन्हें अगाध ज्ञान था। संस्कृत में वे धाराप्रवाह बोलते थे। साथ ही वे प्रचंड तार्किक थे।

स्वामीजी प्रचलित धर्मों में व्याप्त बुराइयों का कड़ा खण्डन करते थे चाहे वह सनातन धर्म हो या इस्लाम हो या ईसाई धर्म हो। अपने महाग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश में स्वामीजी ने सभी मतों में व्याप्त बुराइयों का खण्डन किया है। उनके समकालीन सुधारकों से अलग, स्वामीजी का मत शिक्षित वर्ग तक ही सीमित नहीं था अपितु आर्य समाज ने आर्यावर्त (भारत) के साधारण जनमानस को भी अपनी ओर आकर्षित किया।

स्वामी जी की मृत्यु जिन परिस्थितियों में हुई, उससे भी यही आभास मिलता है कि उसमें निश्चित ही अग्रेजी सरकार का कोई षड्यन्त्र था। स्वामी जी की मृत्यु 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली के दिन सन्ध्या के समय हुई थी।

 

12 फरवरी का दिन यानी आज के इतिहास में भी ऐसी कौनसी महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी हैं। जिसकी जानकारी हमें नही है, उसको जानकर अपने सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकते है।

12 फ़रवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

वास्को द गामा भारत की दूसरी यात्रा के लिए 1502 में अपने जहाज़ में लिस्बन से रवाना हुआ।

इंग्लैंड में राजद्रोह के आरोप में जेन जेन ग्रे को 1544 में मौत की सज़ा दी गई।

नीदरलैंड के नये गवर्नर आस्ट्रिया के डान जान ने 1577 में गृहयुद्ध समाप्त करने का आदेश जारी किया।

विलियम और मेरी 1689 में इंग्लैंड के राजा तथा रानी घोषित किये गए।

नादिरशाह 1736 में फ़्रांस का शासक बना।

कैरेबियाई द्वीप मार्टिनिक पर ब्रिटेन की नौसेना ने 1762 में कब्जा किया।

दक्षिण अमेरिकी देश चिली को 1818 में स्पेन से स्वतंत्रता मिली।

जर्मन ईस्ट अफ़्रीका कम्पनी का 1885 में गठन हुआ।

1912 में चीन में मंचु वंश ने गद्दी छोड़ दी।

1922 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन वापस लेने की घोषणा की।

कम्युनिस्ट पार्टी पर उत्तरी यूरोप के बाल्टिक देश इस्टोनिया ने 1925 में प्रतिबंध लगाया।

गांधी जी ने 1928 में बारदोली में सत्याग्रह की घोषणा की।

जर्मनी की सेना ने 1938 में ऑस्ट्रिया में प्रवेश किया।

1946 की में 14 लोग कलकत्ता दंगों में मारे गए।

सूडान के बारे में मिस्र और ब्रिटेन के बीच 1953 में समझौता हुआ।

मास्को में नोबेल पुरस्कार विजेता सोवियत संघ के अलेक्जेंडर सोल्जेनित्शिन को 1974 में गिरफ़्तार किया गया।

बिहार में 1999 से राष्ट्रपति शासन लागू।

भारत के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को 2009 में कैंम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने डीलिट् की उपाधि से सम्मानित करने की घोषणा की।

उत्तर कोरिया ने 2013 में तीसरा भूमिगत परमाणु परीक्षण किया।

12 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति

1742 में मराठा राजनेता नाना फड़नवीस का जन्म हुआ।

1809 में मशहूर भू-विज्ञानी चार्ल्स डार्विन का जन्म हुआ।

1824 में आर्य समाज के प्रवर्तक और प्रखर सुधारवादी संन्यासी दयानंद सरस्वती का जन्म हुआ।

1871 में एक ईसाई मिशनरी एवं भारत में सामाज सुधारक चार्ल्स फ्रीर एंड्रयूज का जन्म हुआ।

1882 में मशहूर बंगाली कवी सत्येन्द्रनाथ दत्त का जन्म हुआ।

1920 में हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने नायक, खलनायक प्राण का जन्म हुआ।

1967 में भारतीय संगीतकार चित्रवीणा एन रविकिरण का जन्म हुआ।

1972 में भारतीय-अमरीकी अभिनेता अजय नायडू का जन्म हुआ।

12 फ़रवरी को हुए निधन

1266 में दिल्ली के सुल्तान नसीरुद्दीन शाह का निधन।

1794 में रणोजी सिंधिया का अवैध पुत्र और उत्तराधिकारी महादजी शिन्दे का निधन।

1919 में प्रसिद्ध राष्ट्रवादी नेता सूफ़ी अम्बा प्रसाद का निधन।

1919 में भारतीय राजनीतिज्ञ नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर का निधन।

1998 में हिंदी फिल्म हास्य अभिनेता ओम प्रकाश का मुंबई में निधन हो गया था।

 

 

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