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प्राचीन भारत के वस्त्र उद्योग के सुनहरे दिन
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प्राचीन भारत के वस्त्र उद्योग के सुनहरे दिन

Lucknow.वैदिक आख्यानों में वर्णन आता है कि सर्वप्रथम ऋषि गृत्स्मद ने कपास का पेड़ बोया और अपने इस प्रयोग से दस सेर कपास प्राप्त की। इस कपास से सूत बनाया। इस सूत से वस्त्र कैसे बनाना, यह समस्या थी। इसके समाधान के लिए उन्होंने लकड़ी की तकली बनायी। वैदिक भाषा में कच्चे धागे को तंतु कहते हैं। तंतु बनाते समय अधिक बचा हिस्सा ओतु कहा जाता है। इस प्रकार सूत से वस्त्र बनाने की प्रक्रिया ऋषि गृत्स्मद ने दी।

 आगे चलकर विकास होता गया और सूती से आगे बढ़कर रेशम, कोशा आदि के द्वारा वस्त्र बनने लगे। बने हुए वस्त्रों, साड़ियों आदि पर सोने, चांदी आदि की कढ़ाई, रंगाई का काम होने लगा। वस्त्रों को भिन्न-भिन्न प्राकृतिक रंगों में रंग कर तैयार किया जाने लगा और एक समय में भारतीय वस्त्रों का सारे विश्व में निर्यात होता था। यहां के सूती वस्त्र तथा विशेष रूप से बंगाल की मलमल ढाका की मलमल के नाम से जगत्‌ में प्रसिद्ध हुई। इनकी मांग प्राचीन ग्रीक, इजिप्ट और अरब व्यापारियों द्वारा भारी मात्रा में होती थी और ये व्यापारी इसका अपने देश के विभिन्न प्रांतों व नगरों में विक्रय करते थे।

इन वस्त्रों की बारीकी और सफाई को लेकर कहानियां प्रचलित हैं। एक बार औरंगजेब की पुत्री दरबार में गई तो औरंगजेब उसके वस्त्रों को देखकर बहुत खफा हुआ और उसने कहा, नामाकूल! तेरे अंदर की शर्म-हया कहां चली गई जो दुनिया को तू अपने अंग दिखा रही है। उस पर उसकी पुत्री ने कहा, क्या करूं अब्बाजान, यह वस्त्र जो पहना है, वह एक के ऊपर एक ऐसे सात बार तह करने के बाद पहना है।

सत्रहवीं सदी के मध्य में भारत भ्रमण पर आने वाले फ्रांसीसी व्यापारी टेवर्नीय सूती वस्त्रों का वर्णन करते हुए लिखता है ‘वे इतने सुन्दर और हल्के हैं कि हाथ पर रखें तो पता भी नहीं लगता। सूत की महीन कढ़ाई मुश्किल से नजर आती है।‘ वह आगे कहता है कि कालीकट की ही भांति सिकन्ज (मालवा प्रांत) में भी इतना महीन ‘कालीकट‘ (सूती कपड़े का नाम) बनता है कि पहनने वाले का शरीर ऐसा साफ दिखता था मानों वह नग्न ही हो। टेवर्नीय अपना एक और संस्मरण लिखता है, ‘एक पर्शियन राजदूत भारत से वापस गया तो उसने अपने सुल्तान को एक नारियल भेंट में दिया। दरबारियों को आश्चर्य हुआ कि सुल्तान को नारियल भेंट में दे रहा है, पर उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उस नारियल को खोला तो उसमें से ३० गज लम्बा मलमल का थान निकला।‘ सर जोसेफ बेक को मि. विल्कीन्स ने ढाका की मलमल का एक टुकड़ा दिया। बेक कहते हैं कि यह विगत कुछ समय का वस्त्र की बारीकी का श्रेष्ठतम नमूना है।

सर जी. बर्डवुड ने सेक्रेटरी ऑफ स्टेट इण्डिया के अनुरोध पर एक पुस्तक लिखी थी ‘दी इंडस्ट्रियल आट्र्स ऑफ इंडिया‘। इसके पृष्ठ 73 पर वे लिखते हैं कि ‘बताया जाता है कि जहांगीर के काल में पंद्रह गज लम्बी और एक गज चौड़ी ढाका की मलमल का वजन केवल 100 ग्रेन होता था।‘ इसी पुस्तक के पृष्ठ 95 पर लिखा है-‘अंग्रेज और अन्य यूरोपीय लेखकों ने तो यहां की मलमल, सूती व रेशमी वस्त्रों को ‘बुलबुल की आंख‘ ‘मयूर कंठ‘ ‘चांद सितारे‘ ‘बफ्ते हवा‘ (पवन के तारे) ‘बहता पानी‘ और ‘संध्या की ओस‘ जैसी अनेक काव्यमय उपमाएं दी हैं। सूती कपड़े और मलमल का उत्पादन इंग्लैण्ड में क्रमश: 1772 तथा 1781 में प्रारंभ हुआ।

1835 में एडवर्ड बेञ्ज ने लिखा ‘अपने वस्त्र उद्योग में भारतीयों ने प्रत्येक युग के अतुलित और अनुपमेय मानदंड को बनाए रखा। उनके कुछ मलमल के वस्त्र तो मानो मानवों के नहीं अपितु परियों और तितलियों द्वारा तैयार किए लगते हैं। ऐसे वस्त्र जहां बनते थे, उन कुटीर उद्योगों को अंग्रेजों ने षड्यंत्रपूर्वक नष्ट किया। जो अगूंठे उन्हें बनाते थे, उन्हें काट दिया गया। देश आजाद होने के बाद आशा थी,  हम पुन: अपनी जड़ों में जुड़ेंगे। जो अंगूठे कटे, वे वापस मिलेंगे। पर आज भी पश्चिमी तकनीक के आभामंडल में देश जी रहा है। इसे बदलने हेतु चितंन की आवश्यकता है।

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