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खुश मनुष्य ही रहेगा स्वस्थ
13-Oct-2018    |    Views : 000123

खुश मनुष्य ही रहेगा स्वस्थ

 

 LUCKNOW. यूनाइट फाउंडेशन औऱ खुशहाल सेवा संस्थान (हास्य रोग लाफिंग क्लब) की ओर से शनिवार को इलाहाबाद बैंक स्टाफ कालेज के साथ मिलकर विचार गोष्ठी का आय़ोजन किया गया। जिसका विषय जीवन के प्रति उदासीनता कारण एवं निवारण था। इस गोष्ठी में समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों में भाग लिया।

खुशहाल सेवा संस्थान के अध्यक्ष शिवराम मिश्रा ने कहा कि गोष्ठी का मुख्य उद्देश्य भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों स्वस्थ रहने के लिए एक खुशी का महौल देना है। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य खुश रहेगा तो वह स्वस्थ भी रहेगा। शिवराम मिश्रा ने कि अब जिस तरह लोग वास्तविक सुख को त्याग धन के पीछे भाग रहे हैं, उससे हम कहीं न कही उदासीनता की ओऱ जा रहे हैं। शिवराम ने कहा कि आज के समय में लोग सबसे ज्यादा बीपी औऱ शुगर की समस्या से परेशान हैं, इसलिए हंसने को जीवन की धारा में लाना चाहिए, जिससे तमाम रोगों से छुटकारा मिल सके। उन्होंने इस दौरान मदर टेरेसा के भाषण का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने कहा ​था, मुस्कराहट से ही भयंकर बीमारियां दूर हो जाती हैं।

डॉ. एससी तिवारी ने कहा कि अगर भाषा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो उदासीनता अवसाद नहीं है। हम कई कारणों से उदास होते हैं फिर यही उदासीनता अवसाद का रूप ले लेती है। उदासीनता का सबसे प्रमुख कारण, जिसमें हम बगैर बीमार हुए खुद को उससे अलग कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि अगर आपके शरीर में कोई कमी नहीं है तो आप उदासीन नहीं होंगे। जैसे किसी घटना पर कई लोगों का रिएक्शन अलग—अलग हो सकता है। अगर हम बायोलॉजिकली स्ट्रांग हैं तो हम किसी भी परिस्थिति से निपट लेंगे औऱ वह समस्या हमें उदासीन नहीं करेगी। डॉ. तिवारी ने कहा कि आपने जीवन में क्या बेहतर किया उसे सोच कर खुश रहिए और उसकी तारीफ करिए, लेकिन अगर आपके अंदर ऐसी सोच नहीं है तो हैप्पी स्ट्रेश भी आपको उदासीन कर देगी।

उन्होंने कहा कि लखनऊ में तकरीबन 4 लाख वृद्धजन हैं, इनमें 7.5 फीसदी वृद्धजन अवसाद से ग्रसित हैं। वह उदासीनता के माध्यम से गुजर चुके होते हैं। पिछले चार दशकों में सुसाइड का रेट कॉन्स्टेंट है, लेकिन टीनऐज औऱ वृद्धजन में सुसाइड का रेट बढ़ा है। उन्होंने कहा कि जब उदासीनता चरम पर हो तो वह अवसाद का रूप ले लेता है। एक सवाल के जवाब में डॉ. एससी तिवारी ने कहा कि आजकल लोग ज्यादा आत्महत्या कर रहे हैं। सम्मानित औऱ धन से परिपूर्ण होने के बावजूद लोग आत्महत्या कर रहे हैं, इसका कारण है कि उस व्यक्ति को लगता है वह समाज से कट चुका है, उसे समाज में सम्मान नहीं मिल
रहा है। ऐसे में वह इस तरह के कदम उठा साकता है। उन्होंने कहा कि कई बार लोगों को लगता है कि उनके सुसाइड करने से समाज का भला होगा, जिसके चलते वह यह कदम उठा लेते हैं। सम्मानित व्यक्ति अधिकतर इगोस्टिक सुसाइड कर लेते हैं।
डॉ. एस सी तिवारी ने कहा कि आज के समय में एटम बम से भी बड़ी समस्या मोबाइल है। प्रतिदिन तकरीबन तीन से चार माता—पिता हमारे पास आते हैं औऱ कहते हैं कि किसी तरह हमारे बच्चों को मोबाइल से दूर करें। उन्होंने कहा कि अगर आप प्रकृति के नजदीक रहेंगे तो कोई गलत कदम नहीं उठाएंगे। परेशानियों से भागना उसका निवारण नहीं है।

यूनाइट फाउंडेशन के अध्यक्ष पियूष कान्त मिश्र ने कहा कि मनी मैनेजमेंट के साथ ही टाइम मैनेजमेंट भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि हर इंसान को अपने स्वास्थ्य की देखभाल के लिए कुछ समय निकालना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि जब आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा, नाड़ी और अंग सही होगा तो आप अवसाद से ग्रसित नहीं होंगे। उन्होंने हर किसी को सुबह व्यायाम जरूर करना चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान अवधेश शर्मा ने बताया कि हमारा लक्ष्य बड़ा होना चाहिए। हमें हमेशा उन लोगों से संघर्ष करना चाहिए जो अपने प्रयासों के जरिए एक पद तक पहुंचे हैं। प्रतिस्पर्धा आज के जीवन का मूल शब्द है, लेकिन हम स्वयं से कभी प्रतिस्पर्धा नहीं करते। योग जैसे बड़े विषय को हम बहुत छोटा मान रहे हैं। इसे हम सिर्फ इतना समझते हैं कि घुटने का दर्द और जोड़ों का दर्द योग से खत्म हो गया। जबकि हम यह नहीं जानते स्वामी विवेकानन्द और गौतम बुद्ध अपने जीवन में शीर्ष स्थान तक पहुंचे तो सिर्फ योग के माध्यम से ही पहुंचे।आधुनिकता की दौड़ में हम संस्कारों को भूल चुके हैं।

अंशू केडिया ने बताया कि प्रगति और विकास दो अलग अलग शब्द है। अगर प्रगति की बात होती है तो इसका मतलब है हम आर्थिक दृष्टि की होती है लेकिन उस दशा में हम विकास को पीछे छोड़ते जाते हैं। उस दशा में घऱ, परिवार औऱ समाज सबसे दूर होते जाते हैं। वैश्विक खुशहाली रिपोर्ट में हम साल दर साल पीछे होते जा रहे है। ऐसी दशा में अगर आज के दिनों में कोई किसी को हंसा रहा तो उसका योगदान असीम है। हम प्रगति की दौड़ में उदासीनता की ओऱ बढ़ रहे हैं।

इस दौरान डीएन शुक्ला ने बताया कि आधुनिकता की दौड़ में हम अपने संस्कारों को भूलते जा रहे हैं जो कहीं न कहीं हमारे लिए ही नुकसानदेह साबित हो रहा है। हमारी आवश्यकताएं और प्रतिस्पर्धा बढ़ने के कारण हम अपने परिवार के लोगों को ही समय नहीं दे पा रहे है। कई बार बड़े बड़े घरों में रहने वाले लोगों को अकेलेपन के कारण मोहल्ले के लोगों को सहारा बनना पड़ता है। फैमिली कोर्ट में रोजाना 30 से 40 लोग इगो के चलते फाइल होते हैं। आज हमारे पास धैर्य नहीं है। इगो सबसे बड़ा कारण है जिसके चलते मान सम्मान में कमी हो रही है। स्वतंत्रता का अधिकार सबको होना चाहिए लेकिन लक्ष्मण रेखा जरूरी है।

प्रो. डॉ एस के मिश्रा ने बताया कि उदासीनता जैसी समस्या का जड़ से निवारण जरूरी है। मनुष्य योनि को पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। हमारे परिवेश का हम पर भारी प्रभाव पड़ता है। बेहतर जीवन के लिए सूर्योदय के पहले उठकर किसी भी तरह का शारीरिक श्रम जरूरी होता है। इसी के साथ राम बहादुर मिश्र ने कहा आज के समय में हमारा तन औऱ मन दोनों ही बीमार है।

समापन में कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डी एन लाल ने कहा कि इस तरह कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों को सुनने को मिला वह बहुत ही खुश करने वाला है। हमारे तन औऱ मन दोनों का स्वस्थ्य रहना बहुत ही जरूरी है।  मन को खुश करने का सबसे बड़ा साधन योग ही होता है। योग की साधना मन को संयमित करने का सबसे बड़ा साधन है। आज हम अपने में इतना सिमटते जा रहे हैं कि अपने करीबियों की सुख सुविधाओं का भी हमें कोई ध्यान नहीं है। हमें यह सोचना चाहिए कि अगर हमें किसी की सहायता करने का अवसर मिलता है तो वह हमें कितना सुख प्रदान करता है।

कार्यक्रम का संचालन यूनाइट फाउण्डेशन के उपाध्यक्ष राधे श्याम दीक्षित ने किया । कार्यक्रम के दौरान यूनाइट फाउण्डेशन के उपाध्यक्ष डा. पी.के. त्रिपाठी समेत दर्जनो लोग उपस्थित थे।

 

 

 

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