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मेरा नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता,पता जेल
27-Feb-2019    |    Views : 00034

LUCKNOW. शहीद चन्द्रशेखर 'आजाद' ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे। वे शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे।

मेरा नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता,पता जेल

LUCKNOW. शहीद चन्द्रशेखर 'आजाद' ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे। वे शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे।

 क्रांतिकारी आजाद का जन्‍म 23 जुलाई को उत्‍तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बदरका गांव में 1906 में हुआ था। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी अकाल पड़ने पर गांव छोड़ कर मध्‍य प्रदेश चले गये थे। उनकी मां का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा में ही बीता। अंग्रेज शासित भारत में पले बढ़े आजाद की रगों में शुरू से ही अंग्रेजों के प्रति नफरत भरी हुई थी।

आजाद की एक खासियत थी न तो वे दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुल्म सहन कर सकते थे। 1919 में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड ने उन्‍हें झकझोर कर रख दिया था। चन्द्रशेखर उस समय पढ़ाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। महात्‍मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन खत्‍म किये जाने पर सैंकड़ों छात्रों के साथ चन्द्रशेखर भी सड़कों पर उतर आये। छात्र आंदोलन के वक्‍त वो पहली बार गिरफ्तार हुए।

जब 15 साल के आजाद को जज के सामने पेश किया गया तो उन्होंने ने कहा कि मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा पता जेल है, इससे जज भड़क गया और आजाद को 15 बेंतो की सजा सुनाई गई। यही से उनका नाम पड़ा आजाद।

सन 1922 में गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को अचानक बंद कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ गये। तभी वे हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन के सक्रिय सदस्य बन गये। आज़ाद ने क्रांतिकारी बनने के बाद सबसे पहले 1 अगस्‍त 1925 को काकोरी कांड को अंजाम दिया। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन इसके बाद 1927 में बिसमिल के साथ मिलकर उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन का गठन किया।

भगत सिंह व उनके साथियों ने लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला संडर्स को मार कर लिया। फिर दिल्‍ली असेम्बली में बम धमाका भी आजाद ने किया। आजाद का कांग्रेस से जब मन भंग हो गया आजाद ने अपने संगठन के सदस्‍यों के साथ गांव के अमीर घरों में डकैतियां डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाया जा सके। इस दौरान उन्‍होंने व उनके साथियों ने एक भी महिला या गरीब पर हाथ नहीं उठाया। डकैती के वक्‍त एक बार एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन ली तो अपने उसूलों के चलते हाथ नहीं उठाया। उसके बाद से उनके संगठन ने सरकारी प्रतिष्‍ठानों को ही लूटने का फैसला किया।

अंग्रेज चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके लेकिन बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां एवं ठाकुररोशन सिंह को 19 दिसम्बर 1927 तथा उससे 2 दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को फांसी पर लटकाकर मार दिया। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी को छुड़ाने की योजना भी बनायी, लेकिन आजाद उसमें सफल नहीं हो पाये। 4 क्रान्तिकारियों को फांसी और 16 को कड़ी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर 8 सितम्बर 1928 को दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। सभी ने एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया - हमारी लड़ाई आखिरी फैसला होने तक जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत। दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड के आरोपियों भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनाये जाने पर आजाद काफी आहत हुए। आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया।

27 फरवरी 1931 को वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से मिले और आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र-कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने भुनभुनाते हुए बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क चले गये।

आजाद का अंतिम संस्कारअल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मिले और इस बारे में चर्चा कर ही रहे थे कि सीआईडी का एसएसपी नॉट बाबर भारी पुलिस बल के साथ जीप से वहाँ आ पहुंचा। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी हुई और इसी मुठभेड़ में चंद्रशेखर आजाद शहीद हो गये। पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये आज़ाद का अंतिम संस्कार कर दिया था।

27 फ़रवरी का इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारेंमे, उन लोगों के जन्मदिन के बारेमें जिन्होंने दुनिया में आकर बहुत बड़ा नाम किया साथ ही उन मशहूर लोगों के बारेंमे जो इस दुनिया से चले गए।

27 फ़रवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

लंदन में रूस का 1557 में दूतावास खुला।

हेनरी IV 1594 में फ्रांस का राजा बना।

वियना में इंटरनेशनल वर्किंग यूनियन आॅफ सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना 1921 में हुई।

क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में ब्रिटिश पुलिस के साथ मुठभेड़ में गिरफ्तारी से बचने के लिए 1931 में खुद को गोली मार ली।

मिस्र में महिलाओं को 1956 में वोट डालने का अधिकार मिला।

फ्रांस ने 1965 में एकर अल्जीरिया में भूमिगत परमाणु परीक्षण किया।

अमेरिकी साप्ताहिक पत्रिका ‘पीपुल’ की 1974 से बिक्री शुरू।

1988 को पहली बार हेलीकॉप्टर डाक सेवा का उद्घाटन किया गया था।

नाइजीरिया में असैन्य शासन के लिए 1999 में चुनाव।

सन 2001 में गोधरा, गुजरात में अयोध्या से वपास आ रहे कारसेवकों के डिब्बे में मुसलमानों के आग लगाए जाने से 59 हिन्दू कारसेवकों की मौत।

फिलीपीन्स में एक आतंकवादी ने 2004 में एक नाव को बम से उडा दिया जिसमें लगभग 100 से ज्यादा लोग मारे गये।

मारिया शारापोवा ने 2005 में कतर ओपन खिताब जीता।

लान्साना कोयटे 2007 में गुयाना के नये प्रधानमंत्री बने।

लगातार सातवें साल विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए 2008 में 25 महिलाओं को जी.आर-8 सम्मान से नवाजा गया।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2009 में अपनी लोकसभा सीट का उत्तराधिकारी पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल जी टंडन को सौंपा।

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 2013 में एक बाजार में आग लगने से 20 लोगों की मौत।

27 फरवरी को जन्मे व्यक्ति

प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी विजय सिंह पथिक का 1882 में जन्म।

27 फ़रवरी को हुए निधन

1931 में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद का निधन।

1956 में लोकसभा के पहले स्पीकर जी. वी. मावलंकर का निधन।

1976 में कर्नाटक के प्रथम मुख्यमंत्री तथा मध्य प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल के. सी. रेड्डी का निधन।

1997 में हिंदी फ़िल्मों के प्रसिद्ध भारतीय गीतकार इन्दीवर का निधन।

2010 में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के मज़बूत स्तंभ और प्रख्यात समाजसेवक नानाजी देशमुख का निधन।

 

 

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