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सांस के रोगों में लाभदायक नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन
10-Sep-2018    |    Views : 00033

सांस के रोगों में लाभदायक नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन

 

LUCKNOW. प्रदेश में सांस के रोगी बढ़ रहे हैं और इस बदलते मौसम में उनको विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। लखनऊ में इंडियन चेस्ट सोसाइटी के यूपी चैप्टर की ओर से गोमतीनगर के एक होटल में प्रदेश स्तरीय संगोष्ठी के आयोजन में केजीएमयू के डॉक्टर सूर्यकांत ने यह बात कही।

उन्होंने बताया कि इनमें से कुछ सांस के रोगियों को रेसिपी फेलियर और सास की गंभीर स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे रोगियों में अस्थमा, सीओपीडी, निमोनिया, पल्मोनरी एडिमा, एआरडीएस जैसे रोगी शामिल हैं। इन रोगियों की गंभीर स्थिति में टाइप वन या टाइप टू रेस्पिरेटरी फेलियर हो जाता है। टाइप बन रेस्पिरेटरी फेलियर में सिर्फ ऑक्सीजन की कमी होती है जबकि टाइप टू स्पीक फेलियर में ऑक्सीजन की कमी के साथ-साथ कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा भी बढ़ जाती है। ऐसे रोगियों को नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन से काफी लाभ मिलता है। कांफ्रेंस में डॉक्टर सूर्यकांत के अतिरिक्त डॉ. बीपी सिंह, डॉ. अशोक कुमार सिंह, डॉ. अनिल कुमार सिंह, डॉ. आशीष टंडन, डॉ. अजय कुमार वर्मा, डॉ. रवि भास्कर, डॉ. संजय लाल भी उपस्थित रहे।

नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन का वह बाहरी रूप है जिसके द्वारा पॉजिटिव प्रेशर से एक मशीन द्वारा नाक में मास्क लगाकर या नाक और मुंह में दोनों में मास्क लगाकर हवा का प्रवाह रोगी के फेफड़े में दिया जाता है। जबकि मैकेनिकल वेंटिलेशन में एक छोटा ऑपरेशन करके ट्यूब डालकर यह प्रवाह दिया जाता है। नॉन इनवेसिव वेंटिलेशन एक सरल प्रक्रिया है और इसके प्रयोग के दौरान रोगी बात कर सकता है। खांसी कर सकता है, खाना खा सकता है और यह एक आरामदायक उपचार है।

 

 

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