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मानवता के पुजारी रामकृष्ण परमहंस
18-Feb-2019    |    Views : 000152

LUCKNOW. रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया।

मानवता के पुजारी रामकृष्ण परमहंस

LUCKNOW. रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। स्वामी रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं।

मानवीय मूल्यों के पोषक संत रामकृष्ण परमहंस का जन्म 18 फ़रवरी 1836 को बंगाल प्रांत स्थित कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर था। पिताजी के नाम खुदीराम और माताजी के नाम चन्द्रा देवी था।उनके भक्तों के अनुसार रामकृष्ण के माता पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओं और दृश्यों का अनुभव हुआ था। गया में उनके पिता खुदीराम ने एक स्वप्न देखा था जिसमें उन्होंने देखा की भगवान गदाधर ( विष्णु के अवतार ) ने उन्हें कहा की वे उनके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। उनकी माता चंद्रमणि देवी को भी ऐसा एक अनुभव हुआ था उन्होंने शिव मंदिर में अपने गर्भ में रोशनी प्रवेश करते हुए देखा।

सात वर्ष की अल्पायु में ही गदाधर के सिर से पिता का साया उठ गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में पूरे परिवार का भरण-पोषण कठिन होता चला गया। आर्थिक कठिनाइयां आईं। बालक गदाधर का साहस कम नहीं हुआ। इनके बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय कलकत्ता (कोलकाता) में एक पाठशाला के संचालक थे। वे गदाधर को अपने साथ कोलकाता ले गए। रामकृष्ण का अन्तर्मन अत्यंत निश्छल, सहज और विनयशील था। संकीर्णताओं से वह बहुत दूर थे। अपने कार्यों में लगे रहते थे।

सतत प्रयासों के बाद भी रामकृष्ण का मन अध्ययन-अध्यापन में नहीं लग पाया। 1855 में रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय को दक्षिणेश्वर काली मंदिर ( जो रानी रासमणि द्वारा बनवाया गया था ) के मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। रामकृष्ण और उनके भांजे ह्रदय रामकुमार की सहायता करते थे। रामकृष्ण को देवी प्रतिमा को सजाने का दायित्व दिया गया था। 1856 में रामकुमार के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण को काली मंदिर में पुरोहित के तौर पर नियुक्त किया गया।

रामकुमार की मृत्यु के बाद श्री रामकृष्ण ज़्यादा ध्यान मग्न रहने लगे। वे काली माता के मूर्ति को अपनी माता और ब्रम्हांड की माता के रूप में देखने लगे। कहा जाता हैं की श्री रामकृष्ण को काली माता के दर्शन ब्रम्हांड की माता के रूप में हुआ था। रामकृष्ण इसकी वर्णना करते हुए कहते हैं " घर ,द्वार ,मंदिर और सब कुछ अदृश्य हो गया , जैसे कहीं कुछ भी नहीं था! और मैंने एक अनंत तीर विहीन आलोक का सागर देखा, यह चेतना का सागर था। जिस दिशा में भी मैंने दूर दूर तक जहाँ भी देखा बस उज्जवल लहरें दिखाई दे रही थी, जो एक के बाद एक ,मेरी तरफ आ रही थी। अफवाह फ़ैल गयी थी की दक्षिणेश्वर में आध्यात्मिक साधना के कारण रामकृष्ण का मानसिक संतुलन ख़राब हो गया था। रामकृष्ण की माता और उनके बड़े भाई रामेश्वर रामकृष्ण का विवाह करवाने का निर्णय लिया। उनका यह मानना था कि शादी होने पर गदाधर का मानसिक संतुलन ठीक हो जायेगा, शादी के बाद आये ज़िम्मेदारियों के कारण उनका ध्यान आध्यात्मिक साधना से हट जाएगा। रामकृष्ण ने खुद उन्हें यह कहा कि वे उनके लिए कन्या जयरामबाटी(जो कामारपुकुर से 3 मील दूर उत्तर पूर्व की दिशा में हैं) में रामचन्द्र मुख़र्जी के घर पा सकते हैं। 1859 में 5 वर्ष की शारदामणि मुखोपाध्याय और 23 वर्ष के रामकृष्ण का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के बाद शारदा जयरामबाटी में रहती थी और 18 वर्ष के होने पर वे रामकृष्ण के पास दक्षिणेश्वर में रहने लगी। रामकृष्ण तब संन्यासी का जीवन जीते थे।

कालान्तर में बड़े भाई भी चल बसे। इस घटना से वे व्यथित हुए। संसार की अनित्यता को देखकर उनके मन में वैराग्य का उदय हुआ। अन्दर से मन ना करते हुए भी श्रीरामकृष्ण मंदिर की पूजा एवं अर्चना करने लगे। दक्षिणेश्वर स्थित पंचवटी में वे ध्यानमग्न रहने लगे। ईश्वर दर्शन के लिए वे व्याकुल हो गये। लोग उन्हे पागल समझने लगे।

चन्द्रमणि देवी ने अपने बेटे की उन्माद की अवस्था से चिन्तत होकर गदाधर का विवाह शारदा देवी से कर दिया। इसके बाद भैरवी ब्राह्मणी का दक्षिणेश्वर में आगमन हुआ। उन्होंने उन्हें तंत्र की शिक्षा दी। मधुरभाव में अवस्थान करते हुए ठाकुर ने श्रीकृष्ण का दर्शन किया। उन्होंने तोतापुरी महाराज से अद्वैत वेदान्त की ज्ञान लाभ किया और जीवन्मुक्त की अवस्था को प्राप्त किया। सन्यास ग्रहण करने के वाद उनका नया नाम हुआ श्रीरामकृष्ण परमहंस। इसके बाद उन्होंने ईस्लाम और क्रिश्चियन धर्म की भी साधना की।

समय जैसे-जैसे व्यतीत होता गया, उनके कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों और सिद्धियों के समाचार तेजी से फैलने लगे और दक्षिणेश्वर का मंदिर उद्यान शीघ्र ही भक्तों एवं भ्रमणशील संन्यासियों का प्रिय आश्रयस्थान हो गया। कुछ बड़े-बड़े विद्वान एवं प्रसिद्ध वैष्णव और तांत्रिक साधक जैसे- पं॰ नारायण शास्त्री, पं॰ पद्मलोचन तारकालकार, वैष्णवचरण और गौरीकांत तारकभूषण आदि उनसे आध्यात्मिक प्रेरणा प्राप्त करते रहे। वह शीघ्र ही तत्कालीन सुविख्यात विचारकों के घनिष्ठ संपर्क में आए जो बंगाल में विचारों का नेतृत्व कर रहे थे। इनमें केशवचंद्र सेन, विजयकृष्ण गोस्वामी, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम लिए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त साधारण भक्तों का एक दूसरा वर्ग था जिसके सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति रामचंद्र दत्त, गिरीशचंद्र घोष, बलराम बोस, महेंद्रनाथ गुप्त (मास्टर महाशय) और दुर्गाचरण नाग थे। स्वामी विवेकानन्द उनके परम शिष्य थे।

रामकृष्ण परमहंस जीवन के अंतिम दिनों में समाधि की स्थिति में रहने लगे। अत: तन से शिथिल होने लगे। शिष्यों द्वारा स्वास्थ्य पर ध्यान देने की प्रार्थना पर अज्ञानता जानकर हँस देते थे। इनके शिष्य इन्हें ठाकुर नाम से पुकारते थे। रामकृष्ण के परमप्रिय शिष्य विवेकानन्द कुछ समय हिमालय के किसी एकान्त स्थान पर तपस्या करना चाहते थे। यही आज्ञा लेने जब वे गुरु के पास गये तो रामकृष्ण ने कहा-वत्स हमारे आसपास के क्षेत्र के लोग भूख से तड़प रहे हैं। चारों ओर अज्ञान का अंधेरा छाया है। यहां लोग रोते-चिल्लाते रहें और तुम हिमालय की किसी गुफा में समाधि के आनन्द में निमग्न रहो। क्या तुम्हारी आत्मा स्वीकारेगी? इससे विवेकानन्द दरिद्र नारायण की सेवा में लग गये। रामकृष्ण महान योगी, उच्चकोटि के साधक व विचारक थे। सेवा पथ को ईश्वरीय, प्रशस्त मानकर अनेकता में एकता का दर्शन करते थे। सेवा से समाज की सुरक्षा चाहते थे। गले में सूजन को जब डाक्टरों ने कैंसर बताकर समाधि लेने और वार्तालाप से मना किया तब भी वे मुस्कराये। चिकित्सा कराने से रोकने पर भी विवेकानन्द इलाज कराते रहे। चिकित्सा के वाबजूद उनका स्वास्थ्य बिगड़ता ही गया।

अंत में वह दुख का दिन आ गया। 1886 ई. 16 अगस्त सवेरा होने के कुछ ही वक्त पहले आनन्दघन विग्रह श्रीरामकृष्ण इस नश्वर देह को त्याग कर महासमाधि द्वारा स्व-स्वरुप में लीन हो गये।

देश विदेश के इतिहास में 18 फरवरी को ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनके बारेमें हमें पता नहीं आज हम उनके बारे में जानकर अपने सामान्य ज्ञान को बढ़ा सकते है।

18 फ़रवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

जहांगीर ने सन 1614 को मेवाड़ पर कब्जा किया।

फ़्रांसीसी खोजी ला सेले ने 1695 में टेक्सास में बस्ती बसाई।

चार्ल्स गोल्डेन के नेतृत्व में ब्रिटिश फ़ौजें 1884 में सुडान पहुँची।

श्यामजी कृष्णवर्मा ने 1905 में इंडिया होमरूल सोसायटी की स्थापना लंदन में की।

1911 में विमान से पहली बार डाक पहुँचाने का काम भारत में हुआ।

1915 में प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी ने इंग्लैंड की नाकेबन्दी की।

नाजी सेना ने 1943 में व्हाइट रोज आन्दोलन के सदस्यों को गिरफ़्तार किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध में 1945 में इवा जिमा के लिए लड़ाई शुरू हुई।

मुंबई में 1946 में रॉयल इंडियन नेवी (नौसेना) का विद्रोह हुआ।

पहले चर्च आफ़ साइंटोलॉजी की स्थापना 1954 में लॉस एंजिलिस में की गई।

गांबिया को 1965 में ब्रिटेन के शासन से स्वतंत्रता मिली।

भारत ने 1971 में अरवी सैटेलाइट स्टेशन के जरिये ब्रिटेन के साथ पहला उपग्रह सम्पर्क कायम किया।

अमेरिका ने 1979 में भारत को 1664 करोड़ रुपये का चेक दिया जो कि दुनिया में सबसे बड़ी रकम का चेक माना जाता है।

सहारा रेगिस्तान में 1979 में पहली और अब तक के रिकार्ड में अंतिम बार हिमपात की घटना हुई।

अफ़ग़ान सरकार ने 1989 में आपात स्थिति की घोषणा की।

आयरिश रिपब्लिकन आर्मी ने 1991 में विक्टोरिया स्टेशन पर हुए विस्फोट की ज़िम्मेदारी ली, जिसमें अनेक लोग हताहत हुए।

सी. सुब्रह्मणयम 1998 में भारत रत्न से सम्मानित।

बांग्लादेश और भारत के बीच 1999 में बस सेवा पर समझौता।

एफबीआई एजेंट रॉबर्ट हैनसेन को सोवियत संघ के लिए जासूसी करने के आरोप में 2001 में गिरफ्तार किया गया और दोषी ठहराये जाने के बाद उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गयी।

फिजी के विद्रोही नेता जार्ज स्पेट की फ़ांसी की सज़ा को राष्ट्रपति ने 2002 में उम्रक़ैद में बदला।

दक्षिण कोरिया के प्रमुख शहर ताएगु में 2003 में एक मेट्रो ट्रेन में आग लग जाने से 134 लोग मारे गये।

फ़िलिस्तीन के राष्ट्रपति ने 2006 में हमास के नेता इस्माइल हीनया को नई सरकार का गठन करने को कहा।

महाराष्ट्र के पोल्ट्री फ़ार्म में 2006 में भारत का पहला फ़्लू केस दर्ज हुआ।

भारत व पाकिस्तान के बीच 2006 में थार एक्सप्रेस आरम्भ।

भारतीय रिजर्व बैंक ने 2008 में स्विस बैंक यूडीएक एजी को देश में कारोबार करने की अनुमति दी।

18 फ़रवरी को जन्मे व्यक्ति

1486 में भक्तिकाल के प्रमुख संतों में से एक चैतन्य महाप्रभु का जन्म।

1836 में भारत के महान् संत एवं विचारक तथा स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस उर्फ गदाधर चटर्जी का जन्म।

1883 में भारतीय क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा का जन्म।

1894 में स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ रफ़ी अहमद क़िदवई का जन्म।

1899 में स्वतन्त्रता सेनानी जयनारायण व्यास का जन्म।

1925 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी की कथाकार एवं निबन्ध लेखिका कृष्णा सोबती का जन्म।

1926 में भारतीय सिनेमा की सुन्दर व प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में से एक नलिनी जयवंत का जन्म।

1927 में बॉलीवुड के प्रसिद्ध संगीतकार ख़य्याम का जन्म।

1933 में भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्रियों में से एक निम्मी का जन्म।

1941 में अमेरिका के गायक इमा थॉमस का जन्म।

18 फ़रवरी को हुए निधन

मामलुक साम्राज्य (गुलाम वंश) के आठवें सुल्तान नसीरुद्दीन मोहम्मद शाह का 1266 में निधन।

मंगोल सेनापति क़ुबलय ख़ान का 1294 में निधन।

तैमूर लंग का 1405 में निधन।

जर्मन धर्मसुधारक मार्टिन लूथर का 1546 में निधन।

1977 में अमेरिकी अभिनेता एंडी डिवाइन की मृत्यु हो गई।

पद्म भूषण से सम्मानित हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक अब्दुल राशिद ख़ान का 2016 में निधन।

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