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जैविक खाद से करें पर्यावरण संरक्षण
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जैविक खाद से करें पर्यावरण संरक्षण

समान्यतः वर्मी यानि केंचुए और उन्हें पालने का ढंग वर्मीकल्चर कहलाता है। ये केंचुए गलने सड़ने वाले सारे बायोमास को प्राकृतिक तरीके से अपना भोजन बनाते हैं, तथा बहुत कीमती बायो कार्बन प्रदान करते हैं। यह पोषक तत्वों से भरपूर अच्छी गुणवत्ता वाली प्राकृतिक खाद है, जो कि सामान्य गोबर खाद से बेहतर होती है और पौधों के बहुमुखी विकास के लिए सहायक होती है।

वैसे तो विश्व भर में 3000 किस्म के केंचुए पाए जाते हैं। भारत में अभी तक 350 किस्मों की ही पहचान की गई है। इनमें से रैड वर्म ऐसीनिया फोइटेडा व अफ्रीकन नाइट कालर ऐडिलुइस योजिनाई, वर्मी कम्पोस्ट हेतु उत्तम माने गए हैं। जोकि हर प्रकार के बायोमास को आसानी से पचा लेते हैं और इन्हें 0 से 40 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान तक आसानी से पाला जा सकता है। लेकिन सामान्यतः 20 से 30 डिग्री का तापमान इनके लिए उपयुक्त होता है।

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जब प्राकृतिक बायोमास केंचुओं के सम्पर्क में आता है, उसी समय प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। केंचुए अधगले बायोमास को बारीक टुकड़ों में काटते हैं तथा अपना भोजन बनाकर आसानी से पचा जाते हैं। उनके द्वारा छोड़ा गया व्यर्थ प्रदार्थ यानि बायोकार्बन उत्पादकता बढ़ाने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं के लिए बायोएनर्जी के रूप में काम आता है। केंचुए एनारोबिक बैक्टिरिया से 20 गुणा ज्यादा/यूनिट बायोकार्बन छोड़ते हैं।

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यह खाद 45 से 60 दिन में तैयार हो जाती है। यह भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने में सक्षम है। यह पौधों के समग्र विकास में सहायक है। इसके साथ यह पौधों की बिमारियों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ाती है। साथ ही यह रासायनिक खाद का अच्छा विकल्प है। यह पर्यावरण की स्वच्छता में सहायक होता है।

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